कड़ी मेहनत Best Moral Story In Hindi

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ये कहानी फूल बेचने वाले भोलाराम की है, भोलाराम एक मेहनती इंसान था, वह किसी सेठ के बगीचे में काम भी करता और दिन भर फूल भी बेचता | सुबह और शाम को वो सेठ के बगीचे की देखभाल करता और बाकी दिन के समय में वो पास के गांव में जाकर फूल बेचता था, उसकी इस मेहनत से सेठ रामलाल बहुत खुश थे | सेठ रामलाल एक बुजुर्ग इंसान थे, वो की घर अपने घर में अकेले ही रहते थे, पत्नी गुजर चुकी थी, बेटा और बहु शहर में रहते थे | भोलाराम सेठ रामलाल के बगीचेki बहुत अच्छे से देखभाल करता था, बिलकुल अपने बगीचे की तरह | पर भोलाराम का कोई बगीचा नहीं था, उसका एक सपना था वो भी एक दिन अपना खरीदेगा और उसमे तरह तरह के फूल लगाकर उन्हें बाजार में बेचेगा | वही सेठ रामलाल घर में अकेले रहते थे इसलिए उनके बेटे ने उन्हें कई बार उन्हें हमेशा के लिए उनके पास आने के लिए कहता था, पर सेठ रामलाल उसकी बात को ताल दिया करते थे, पर एक बात उनके मन में अक्सर चलती रहती की किसी न किसी दिन तो बेटे के पास जाना ही होगा|

आज भी यही बात उनके मन में चल रही थी, अब मैं बूढ़ा हो चला हूँ, बुढ़ापे में अब मुझसे कोई काम तो होगा नहीं और वैसे भी इस बुढ़ापे में मेरी सेवा यहाँ कौन करेगा, अब मुझे अपने बेटे और बहु के पास शहर चले ही जाना चाहिए | यह सोचकर सेठ रामलाल अगले महीने अपने बेटे के घर जाने का फैसला करते है | अगले दिन बगीचे में एक आदमी आता है, वो बगीचे में काम कर भोलाराम से सेठ रामलाल के पूछता है, इतनी देर में सेठ रामलाल खुद ही बगीचे में आ जाते है. वो आदमी सेठ रामलाल से बगीचा खरीदने की बात करता है, वो बगीचे के कम पैसे देने की बात करता है तो सेठ रामलाल उसे बगीचा बेचने से मना कर देते है और वो आदमी वहां से चला जाता है, भोलाराम आश्चर्य में पड़ जाता है वो सेठ रामलाल से पूछता है की सेठ जी क्या आप बगीचा बेच रहे है, सेठ रामलाल उत्तर देते है – हाँ !
फिर भोलाराम पूछता है क्यूँ ? सेठ रामलाल कहते है – भोलाराम तुम तो जानते हो, तुम्हारी सेठानी के गुजर जाने के बाद से सी मैं इस घर में अकेला रहता हूँ, तो सोच रहा हूँ की शहर में अपने बेटे के यहाँ चला जाऊ, वैसे भी हर दिन मैं बूढ़ा होते जा रहा हूँ, इस बुढ़ापे में मेरी देखभाल कौन करेगा !

भोलाराम सेठ जी से कहता है – सेठ जी आप ऐसा क्यूँ कह रहे है, मैं हूँ ना, मैं करूँगा आपकी देखभाल, आप फ़िक्र मर करे मैं आपकी बहुत अच्छे से देखभाल करूँगा !
अरे नहीं नहीं भोलाराम मैं जनता हूँ तुम मेरी देखभाल कर सकते हो, वैसे भी मेरा बेटा रोज फ़ोन लगाकर मुझे अपने घर आने के लिए कहता है और मेरे पौता-पौती भी मुझे याद करते रहते है, तो सोच रहा हूँ की वही चले जाओ, वैसे भी कभी ना कभी तो मुझे उनके पास जाना ही होगा | यह कहकर सेठ रामलाल अपने कमरे में चले जाते है | भोलाराम भी शाम को बगीचा का काम निपटाकर अपने घर आ जाता है, वो सोचता है की सेठ जी तो अपना बगीचा बेच रहे है और मुझे भी फूलो के एक बगीचा खरीदना होगा, तो क्यूँ न मैं ही सेठ जी का बगीचा खरीद लूँ | फिर वो अभी तक के अपने जमा किये हुए पैसे देखता है और कहता है – मेरे पास तो इतने पैसे नहीं है की मैं सेठ जी का बगीचा खरीद पाऊ, लेकिन फिर भी मुझे सेठ जी एक बार इस बारे में बात करनी चाहिए |

वो कल सबेरे ही सतह रामलाल से बगीचा खरीदने की बात करता है और कहता है – सेठ जी मेरे फूलो के धंधे के लिए मैं आपका बगीचा खरीदना चाहता हूँ, आप ये बगीचा कितने में बेचेंगे | सेठ जी कहते है – देखो भोलाराम हमेशा से ही तुमने इस बगीचे की देखभाल बहुत अच्छे से की है, तुमने इसे अपने बगीचे की तरह रखा | इसलिए मैं तुम्हे ये बगीचा ५०० सिक्को में बेच सकता हूँ | फिर भोलाराम कहता है – पर सेठ जी मेरे पास तो इतने सिक्के नहीं, मेरे पास ४०० सिक्के है, इतने सिक्के मैं आपको अभी दे देता हूँ, बाकी के सिक्के आपके शहर जाने से पहले कुछ ही दिनों में लौटा दूंगा | सेठ जी भोलाराम की बात से सहमत हो जाते है, और वो अपना बगीचा उसे बेच देते है | खुद का बगीचा खरीदने के सपने के पूरा होते ही भोलाराम बहुत खुश होता है, पर उसके सामने सेठ रामलाल के बाकि के १०० सिक्के चुकाने की बड़ी चुनौती भी होती है, अब वो पहले से कुछ मेहनत करता है, ज्यादा से ज्यादा फूल बेचता है और कुछ ही दिनों में सेठ जी बाकी पैसे भी चूका देता है | तो आख़िरकार भोलाराम की इतनी मेहनत काम आयी और उसने अपने सपने को पूरा कर ही लिया |

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