A Army Man Story In Hindi For Kids – Short Moral Story

A Army Man Story In Hindi For Kids – Short Moral Story

बाकानेर गांव में एक आदमी रहता था, जिसका नाम रतन सिंह था जो की इंडियन आर्मी में था | उसकी एक 8 साल की बच्ची थी, इसका नाम स्नेहा था वो बच्ची अपने पिता से बहुत प्यार करती थी | अक्सर वो अपने पिता की नक़ल भी उतरा करती, रतन सिंह वैसे तो फौज की नौकरी करते थे इसलिए वो घर पर नहीं रहते थे | घर पर स्नेहा और उसकी माँ ही रहती थी | पर जब उसके पिता छुट्टियों में आते तो कभी कभी वो अपने पापा की आर्मी वाली ड्रेस पहन लेती थी और खिलोने वाली बन्दूक ले के पुरे घर में दौड़ा करती और कहती कि मैं भी एक दिन पिता जी तरह बड़ी होकर फौज में जाउंगी और सारे दुश्मनों को अपनी बन्दूक से मार गिराऊंगी |

उसकी माँ इस बात पर मुस्कुराते हुए उससे कहती की नकली बन्दूक लेकर घर में दौड़ना और असली बन्दूक से देश की सीमा पर लड़ने में बहुत फर्क है, तुम अभी छोटी हो, तुम्हे अपनी पढाई पर ध्यान देना चाहिए लाओ ये बन्दूक मुझे दो और जाकर पढ़ाई करो | स्नेहा अपनी माँ की बात सुनकर पढ़ाई करने बैठ जाती है, स्नेहा बहुत संस्कारी लड़की थी वो आसानी से हर किसी की बात मन लेती थी और बढ़ो का सम्मान भी बहुत अच्छे से करती थी |

२ दिन बाद स्नेहा का बर्थडे आने वाला था तो वह अपने पिता जी से जन्मदिन की तयारी के लिए बाजार से सामान लाने को कहती है और दोनों बाप बेटी बाजार जाकर जन्मदिन का जरुरी सामान लेकर आते है. दूसरे ही दिन उसके पिता को आर्मी से फ़ोन आता है, बॉर्डर पर जंग छिड़ जाने के लेकर उसके पिता को तुरंत निकलना होता है | स्नेहा उसके पापा से कल उसके जन्मदिन तक रुकने की बात कहती है तो उसके पिता उसे समझते है कि उनका जाना बहुत जरुरी है, बॉर्डर पर उनकी जरुरत है |

और एक फौजी के लिए अपना देश सबसे पहले, बाद में रिश्ते | इसलिए मुझे अभी जाना होगा, स्नेहा इस बात को लेकर उदास थी | उसके पिता ने कहा – बेटी उदास मत हो जैसे ही जंग खत्म होगी मैं वापस आ जाउंगी और उदार से तुम्हारे लिए ढेर सारी खिलोने वाली बन्दूक लेकर आऊंगा | ये कहकर उसके रवाना हो गए, देश की बॉर्डर पर बहुत दिनों तक जंग चलती रही, स्नेहा अपने पिता के लौट कर आने का इंतज़ार करती रही |

कुछ दिनों के बाद खबर आयी की रतन सिंह उस जंग में शहीद हो गए, स्नेहा अपने पिता के लिए फुट फुट कर रोने लगी | उसके पिता को राष्ट्रीय सम्मान दिया गया, उनकी बहादुरी के लिए उन्हें कई पुरस्कार भी दिए, इस बात से स्नेहा को अपने पिता पर फक्र हुआ और उसने भी बड़ी होकर आर्मी में फर्टी होने का फैसला लिया |

वो बचपन से पढाई में बहुत अच्छी थी, और आर्मी में भर्ती होना उसने अपना गोआल बना लिया था | बड़ी होकर अपने पिता की तरह वो भी आर्मी में भर्ती हो गयी और सच्ची निष्ठा से देश की सेवा में लग गयी | उसका जोश और जूनून देकर देश की तरफ से उसे कम उम्र में ही कई पुरस्कार से सम्मानित किया गया और आज भी देश की सेवा में कार्यरत होकर अपने पिता का नाम रोशन कर रही है |

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