A Helpless Labour Story In Hindi – Moral Story In Hindi

A Helpless Labour Story In Hindi – Moral Story In Hindi

ये कहानी गांव के छोटे मजदुर बिरजू की है जो रोजी रोटी की तलाश में कुछ समय पहले गांव से शहर चला गया था | शहर में उसे मजदूरी के लिए रोज कोई न कोई मिल ही जाता था, जिससे वो अपने परिवार का पालन पोषण कर पाता था | बिरजू शहर में अपनी बीबी और एक ६ साल के छोटे बच्चे के साथ रहता था | अभी उसकी बीबी गर्भवती थी, तो उसकी दवाई और खर्चे में ही रोज का कमाया हुआ सारा पैसा चले जाता था | ऐसी हालत थी अगर वो किसी दिन काम पर तो उसके बीबी और बच्चे को भूका ही सोना पड़े | पर बिरजू बखूबी ही अपनी जिम्मेदारी निभाता था, अपने काम में किसी भी तरह की आलस ना करते हुए, वो हफ्ते के सातो दिन काम पर जाता था |

पर कुछ दिनों से आयी कोरोना की महामारी के कारण वो काम पर नहीं जा पाता था | इसके चलते उसके पास घर का खर्चा चलाने के लिए पैसे भी नहीं थे, तो ऐसी परिस्थिति उसकी बीबी अपनी शादी के गहने बिरजू को देकर कहती है की इन्हे आप किसी ज्वरी को बेच दीजिये, जो पैसे आएंगे उनसे हम अपने घर का खर्च निकल लेंगे | बिरजू अपनी बीबी के गहने बेचना तो नहीं चाहता था पर उसके पास इसके अलावा कोई रास्ता भी नहीं था | वो  गहने लेकर उन्हें बेचने के लिए किसी ज्वरी को ढूंढने लगा | मगर लॉक डाउन के कारण सोने की दुकाने भी बंद थी और जैसे तैसे करके ज्वरी के घर का पता निकाल कर उसके घर पंहुचा | और उसके सामने अपने गहने बेचने की बात की, सेठ ने उसकी मुसीबत का फायदा उठाया और उसे गहनों का कम दाम देने की बात कही |

उस ज्वरी ने बिरजू से यह कहा की अभी बाजार भी बंद है और सब लेन देन भी बंद है, तो इस वजह से वो उसके गहनों का उससे ज्यादा दाम नहीं दे पायेगा | बिरजू मुसीबत में था, अपने बीबी और बच्चे के लिए उसे ये गहने किसी भी तरह बेचने ही थे | वो कम दाम लेकर ही वहां से चला गया  और जो अपने घर का रासन लेकर वापस आ गया | उन पैसो से कुछ दिनों तक तो उसके घर का खर्चा निकल गया था, लेकिन कोरोना महामारी फैलती ही जा रही थी इसके कारण लॉक डाउन ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रहा था, ना ही कोई काम मिल पा रहा था | इस तरह उसने अपने पास के जो कुछ गहने बचे थे सब बेच दिया और घर का खर्चा चलाता रहा |

उसने देखा की कोरोना के चलते लॉक डाउन और समय तक चल सकता है | अगर ऐसा रहा तो वो अपने बीबी और बच्चे को खाना भी खिला पायेगा | वो जिस गांव से आया था, वहां के किसानी करते थे, तो बिरजू ने सोचा जब तक सब ठीक नहीं हो जाता उसे गांव चले जाना चाहिए | वहां उसे खेतो में करने लिए मजदूरी तो मिल ही जाएगी, भले ही रोज  मिलेगा पर हफ्ते में अगर ३-४ रोज भी काम मिल जायेगा तो उसका परिवार भूखा नहीं रहेगा | तो उसने अपनी बीबी से कहकर गांव जाने का फैसला किया | पर लॉक डाउन के कारण सभी यातायात की सुविधाएं बंद थी और उसका भाव भी शहर से काफी दूर था, इतनी दूर पैदल भी नहीं जा सकते थे क्यूंकि उसकी पत्नी गर्भवती थी | पर उसकी पत्नी ने उसका हौसला बढ़ाया और कहा – आप फ़िक्र मत करो मैं पैदल चल लुंगी, थोड़ा रुक रुक कर हम आराम से चलेंगे तो हम गांव पहुंच ही जायेंगे | बिरजू के पास दूसरा कोई उपाय भी ना था, वो मजबूरन अपनी गर्भवती पत्नी और बच्चे लेकर शहर से पैदल पैदल ही गांव की और रवाना हो गया |

रास्ते में वो कुछ जगहों पर रुके वो जो साथ में खाना बना कर घर से रवाना हुए थे वो खाकर उन्होंने अपना गुजारा किया | एक हाथ में कपड़ो की पोटरी और एक हाथ में अपने बच्चे का हाथ थामे बिरजू अपनी गर्भवती बीबी के साथ गांव की और आगे बढ़ता रहा | इसमें उसकी गर्भवती पत्नी ने बहुत सहयोग दिया उसका हौसला बनकर उसके साथ चलती रही | पर वो बहुत ज्यादा थक चुकी थी, उसकी कमर और पैरो में बहुत दर्द होने लगा | अब उससे और नहीं चला जा रहा था |  बिरजू ने एक रात वही किसी पेड़ के निचे गुजारी और फिर सबेरे धीरे धीरे वो गांव की और रवाना हो गए | करीब २ दिनों के बाद वो अपने गांव पहुंचे, गांव में पहुंचते ही वो अपने पुराने घर गए वो उसे जाकर ठीक किया, उसे ठीक करते करते ही रात हो गयी |

खाना बनाने के लिए कोई राशन नहीं और जो खाना वो अपने साथ बनाकर लाये थे वो खाना भी ख़राब हो चूका था | पर मज़बूरी में उन्हें वो ख़राब खाना खाना पड़ा और फिर दूसरे ही बिरजू गांव के किसानो के पास जाकर काम ढूढ़ने लगा | उसे खेतो में मजदूरी मिल ही गयी, बिरजू पहले से ही बहुत मेहनती था और अपने घर का हालात जानता था | वो अपना काम बड़ी ईमानदारी से करता, जिससे किसान उससे खुश होकर और अधिक काम देने लगे | और इस तरह उसके घर के गुजारा थी ढंग से चलने लगा | फिरजु ने बड़े अच्छे अपने परिवार के लिए अपने फ़र्ज़ को निभाया और कुछ महीनो के बाद उसके घर एक प्यारी से बेटी हुयी | घर में लक्ष्य के रूप में बैठी पाकर उसका परिवार पूरा हुआ |

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